मंगल कुल संगम

जनवरी 13, 2009

कहने को काफ़ी है लेकिन, कैसे कहूँ मैं यारा.

असमंजस है कहने का, मैं रहा प्यार का मारा.

Water lilies

तय करो कि देश किसका है

नवम्बर 27, 2008

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भ्रष्ट-तन्त्र का दंश ही, भुगत रहा है देश.

बार-बार दोहरा रहा, फ़िर क्यों सोया देश.

फ़िर क्यों सोया देश,उठे मारे दुश्मन को.

मग्र है मुश्किल, कैसे पहचाने दुश्मन को?

कह साधक इस देश का मालिक राम-वंश ही.

क्यों भुगते फ़िर देश, रावणी-तन्त्र का दण्श ही?

दिल्ली-जयपुर-मुम्बई, गिनती ना रही याद.

आम आदमी देश का, कहाँ करे फ़रियाद.

किसे करे फ़रियाद,सभी हैं धर्म से निरपेक्ष.

कैसे जिम्मेदारी समजें, कैसे हों सापेक्ष.

कह साधक भारत के ह्रदय में आग लगी है.

विप्लव करके छोङेगी,वह आग लगी है.

रोना है तो जाईये, उस ईश्वर के पास.

वही बचाये देश को, कहिये बात ये खास.

कहिये बात ये खास, जगत का मंगल कारी.

घर का दुश्मन ना पहचाने, क्या लाचारी!

कह साधक हिन्दु निज कर हथियार उठाईये.

या ईश्वर के पास, रोना है तो जाईये.

अच्छा!हमने मान ली,बात आपकी एक.

मुसलमान का दोष नही, वे हैं पूरे नेक.

वे सारे हैं नेक,जो काफ़िर मार रहे हैं.

भारत की सत्ता को जो ललकार रहे हैं.

कह साधक वे धर्म कर रहे, कुरान मान ली.

अब हम क्या करें, बता दें, वही मान ली.

रोयें,कल फ़िर रोना है, रोने को मजबूर.

तन्त्र कहेगा फ़िर वही, जिसके हित मशहूर.

तन्त्र बङा मशहूर,किसी को दोष ना देगा.

सिर्फ़ हवा में लहरा कर मुक्का तानेगा.

कह साधक इस दुष्ट-तन्त्र से कुछ ना होना.

हिन्दू जब तक नहीं उठेगा, तब तक रोना.

नेता कैसे बोलेगा, उसे चाहिये वोट.

मुसलमान को बोल दो, दे ना सके वो वोट.

दे ना सके वह वोट,तो नेता चिल्लायेगा.

उनको खुद गद्दार, ये नेता बतलायेगा.

कह साधक मोमिन सब जाने, ना बोलेगा.

उसे मिल रहे नोट,तो वह कैसे बोलेगा!

‘परिवर्तन आएगा ‘

नवम्बर 22, 2008

वह कहते हैं परिवर्तन आएगा,
हाँ,शायद परिवर्तन आएगा,
टूटी कड़ियों को फिर से जोड़ा जाएगा,
उन्हें उम्मीद है परिवर्तन आयेगा .

अब परिवर्तन आवश्यक है
विचारों की आवश्यकता से,
अनुशासन की आवश्यकता से ,
स्वच्छ मानसिकता की आवश्यकता से ,
हाँ ,इन सब की आवश्यकता से ,एक भौतिक बदलाव आएगा.

हाँ ,जब वह कहते हैं कि बदलाव आयेगा,
तो आशा होती है कि बदलाव आएगा.
सरकारी दफ्तरों में सही आचरण से जो परिवर्तन की लहर उठेगी.
भ्रष्टाचारियों के मरण से जो परिवर्तित हवा चलेगी .
तो ,चौराहों के मुख बदलेंगे ,
कर्मचारी रिश्वत नहीं लेंगे,
शहीदों का फिर होगा सम्मान,
नेता जनहित कार्य करेंगे.

स्पष्टवादिता का युग आएगा ,
फाईलें भारी नहीं होंगी,
दूध में निरमा नहीं होगा,
आदमी तब निकम्मा नहीं होगा,
नियत खोटी नहीं होगी,
संसाधनों की कमी नहीं होगी,
हँसी खुशी की हर और होगी.
लगता है ना..रामराज्य आयेगा?

हाँ, शायद लगता है की परिवर्तन अवश्य आएगा.
घुमड़ घुमड़ कर फिर प्रश्न यही है
मित्र!परिवर्तन कौन लायेगा?
मैं फिर यही कहता हूँ ,
जो लाया है यह स्थिति,बदलाव भी वोही लाएगा.

हाँ ,हमें ही बदलना होगा,
उतरना होगा खरा
उनकी,अपनी,सब की आशा पर,
संस्कार.संस्कृतमय भारतवर्ष को फिर से ,
ज्ञानमय ,विज्ञानमय विकसित करेंगे.

भ्रष्टाचार मिटा कर, सदैव सत्यमेव जयते कहेंगे.
तब सब वास्तव में यही कहेंगे…
जी हाँ,बदल रहा है भारत !
सच ही तो है…आएगा परिवर्तन आएगा!
—————श्री प्रदीप शिशौदिया ————————————————————

हिन्दू संस्कृति

नवम्बर 20, 2008

 हिन्दू संस्कृति मूलतः, वन-संस्कृति का बिम्ब .ऋषि-कृषिअमय संस्कृति,मंगल का प्रतिबिम्ब.

मंगल का प्रतिबिम्ब,विश्व-बंधुत्व सिखाती .सत्य-अहिंसा-त्याग-प्रेम का पाठ पढाती .

कह साधक कविराय, मिटायें भोग विकृति. वन-वनवासी से संरक्षित  हिन्दू संस्कृति . 

वेद-उपनिषद- महाभारत,रामायण है साक्ष्य . वन-वनवासी संस्कृति,शाश्वत-शुद्ध-उपास्य .

शाश्वत-शुद्ध-उपास्य ,सभी अवतार बताते. इसकी रक्षा हित धरती पर हरदम आते .

कह साधक कविराय,इसीमें है सबका हित. भ्रम को छोड के फिर अपनाओ वेद-उपनिषद .

राम-कृष्ण-महावीर-बुद्ध, सबपर है उपकार,आत्मा की हो साधना, या समाज संस्कार .

हो समाज संस्कार, सदा वन-वन्वासी ही, सब पक्षों में आगे रहा है वनवासी ही.

कह शाधक फिर आये गीता-गायक कृष्णा.वनवासी को गले लगाये रामा-कृष्णा .

राम से ज्यादा  काम का, सदा राम का नाम.हनुमानजी मस्त है लेकर राम का नाम .

लेकर राम का नाम तैरते पत्थर देखे. युगों-युगों तक राम-सेतु के चर्चेलेखे .

कह साधक यह काम बडा है राम से ज्यादा, कौन समझता वनवासी को राम से ज्यादा.

मोरपँख-वंशी बने,गिरधर की  पहचान,लकुटि, कमरिया गाय भी, वन संस्कृति की शान .

वन संस्कृति की शान .घटोत्कच,बर्बरीक है,खाटू श्याम-शीश के दानी बर्बरीक हैं .

कह साधक कवि, वनवासी सिर्मौर बने यूँ .गिरधर की पहचान, मोरपँख-वँशी बने यूँ . 

२३--०८.

 

 

 

फ़िल्म समीक्षा-फैशन

नवम्बर 8, 2008

देशसमाज की वर्तमान अवस्था को देखकर जिनको पूरी तरह निराशा लगती है- जिनको लगता है कि अब इन्डिया रुपी कैंसर-गाँठ का ठीक होना असंभव है-जैसे कैंसर के रोगी की मृत्यु निश्चित होती है,वैसे ही अब भारत को मरे बिना मुक्ति नही मिल सकती- उन सब  निराश चिन्तकों को फैशन फ़िल्म देखनी चाहिये.इस फ़िल्म की नायिका को भी इन्डिया की तरह माडल बनने की इच्छा हो जाती है.  परम्परागत  संस्कारों की झिझक के साथ बहुत वेदना पूर्वक माडलिंग की दुनियाँ के सांचे में ढलती है नायिका.उसे कदम-कदम पर टोकने और सावधान करने वाले मिलते हैं,वह सबसे मुकाबला करते हुये सफलता की और बढती है . परिणामतः चारित्रिक पतन के गड्ढे में गिरती है,पूरी तरह बर्बाद होती है- जैसे आज इन्डिया बनने के प्रयत्न में भारत  हो रहा है.

बस! इसी मोङ पर आकर मधुर भन्डारकर की परीक्षा थी. कहानी अपने तार्किक अन्त तक गई थी.संदेश पूरा हो गया था कि बुरे का अन्त बुरा ही होता है. टोप माडल बनने की धुन में हर तरह का समझौता करना,अपने भावनात्मक तनावों से घबराकर नशे के भँवर में फ़सते जाना. और अन्ततः लावारिस मौत मर जाने के कई किस्से मीडीया ने पहले ही खोलकर रखे हैं, कंगना रानौत की मृत्यु पर दर्शक को जरा भी सहानुभूति नहीं होती, एक स्वाभाविक परिणति लगती है सबको. किन्तु, भारत का चिन्तन इससे आगे जाता है.” हार उसकी नहीं होती जो गिर गया, बल्कि उसकी होती है जो वापस उठकर चलने ना लगे.”-हमारी नायिका का पिता उसे ढाढस बंधाते हुये कहता है. अपने पिता का आशीर्वाद प्राप्त करके नायिका पुनः उसी  नरक समझे जाने वाली दुनियाँ में कदम रखती है, अपनी शर्तों पर पुनः विजय प्राप्त करती है. जैसे कोई विष पीकर अमर हो गया हो ऐसा दिव्य भाव छोङती है यह फ़िल्म.और इस बार नायिका को सफ़लता का संतोष कम होता है, इस बात का ज्यादाकि इस गई-गुजरी परिस्थिति में भी लीक से हटकर काफ़ी कुछ करने को हैराष्ट्रीय-सामाजिक संदर्भों में सोचने वालों को कई बार चौंकाकर खुश करती है फ़िल्म.मैं खुद फ़िल्म देखते हुये अपनी तीन वर्षीया नातिन हंसिका की बात सोच रहा था.  स्कूल से लौटकर

 

नवम्बर 1, 2008

राजनीति ही कर रहे ममता हो या वाम. टाटा का भी देखलो निकल गया है राम.
निकल गया है राम,ना देखा हित जनता का. कार जरूरी है,या जरूरी हित लोगों का ?
कह साधक कविराय ,याद कर राम की नीति.राम छोङ कर भटक रही है राज की नीति. २.

टाटा ने दिखलाई है , नेता को औकात .दोनों ताकते रह गये ,नैनो की बारात .
नैनो की बारात ,ना जाने कहाँ रुकेगी .कृषकों को झांसा देकर के पुनः ठगेगी .
कह साधक कवि , कार –कृषक में मची लङाई . कृषि हारेगी,नैनो टाटा ने दिखलाई . ३.

जनता कहाँ है देखलो ,सिंगुर का मैदान .राजनीति- टाटा करे, जनता की ही हान .
जनता की ही हान ,जमीं दे दो या ना दो.मरना दोनों तरह ,किसी भी तरफ वोट दो.
कह साधक कवि,रावण हो गया तंत्र देखलो, सिंगुर का मैदान ,कहाँ जनता है देखलो . ४.

उल्टी गंगा बह रही, कृषक हुआ बेकार ,टाटा की खातिर बिछे,पलक-पाँवङे यार.
पलक-पाँवङे यार,देश ऋषि-कृषकों का था .ऐसे दिन भारत में हों किसने सोचा था ?
जब साधक कवि नेता खुद बन गया लफ़ँगा,कृषक हुआ बेकार,बह रही उल्टी गंगा . ५.

लुटते आये हैं सदा , खेती और किसान ,राजा ठाकुर ना रहे, ना ही जमींदार.
ना ही जमींदार, आ गया प्रजातन्त्र भी ,प्रजा मगर नीचे है ,हावी रहा तंत्र ही .
साधक आम आदमी सदा पिटते आये हैं .खेती और किसान सदा लुटते आये हैं . ६.

जो किसान खुद ना मरे ,वे सिंगुर में ढेर .हैं आश्रित इस तंत्र के , मरना देर-सबेर.
मरना देर-सबेर ,तो डर किस बात का प्यारे . करके निश्चय पलट व्यवस्था, समय पुकारे.
कह साधक कविराय,बदल लें किस्मत वे खुद .धरती की रक्षा करते वे,जो किसान खुद . ७.

ममता-टाटा-बुद्धदेव ,सबने लूटा खूब . सिंगुर बना है देश यह ,लूट मची भरपूर .
लूट मची भरपूर ,अमरीका को बुलवाया . परमाणु-करार की खातिर फिर लुटवाया .
कह साधक कविराय,मत धरो मन में समता .देश बचाओ मन में लेकर माँ की ममता. ८.

नेताओं के हाथ ही खतरे में है देश ,सिंगुर ने है दे दिया , साफ-साफ संदेश.
साफ-साफ संदेश,लुट रहे किसान बेबस . जमीं गई-टाटा भी गये,तो किसका है बस ?
कह साधक कवि ,नहीं दर्द कुछ नेताओं के .अच्छा है अब ,जूते मारो नेताओं के . ९.

वाम-पंथ ने कर लिया , पूँजी से गठ-जोङ ,टाटा को बुलवा लिया,ली किसान से होङ .
ली किसान से होङ ,कृषि के बदले गाङी .नीति और सिद्धान्त ,जमीं में गहरी गाङी .
कह साधक माया ना मिली ना राम पंथ को,सत्ता की ममता ने घेरा वाम-पंथ को . १०.

खूब कहावत बन गई, बाप बङा ना भैया,वाम-पंथ से पूछ लो सबसे बङा रूप्पैया .
सबसे बङा रुप्पैया ,टाटा ने बतला दी ,दोनों दलों को एकसाथ औकात दिखा दी.
कह साधक, जनता हाथी है,टाटा महावत.उठा सूँड से,पटक-पछाङे-खूब कहावत. ११.

पैसा-सत्ता-बाहुबल,राक्षसी गठ-जोङ .जनता को हैं लूटते, मचा-मचा कर होङ .
मचा-मचा कर होङ ,करोङों वारे-न्यारे ,टाटा चार सौ करोङ, सिंगुर में हारे .
पूछे साधक हिसाब ,जो पलटा दे पत्ता .एक-लाख में कार ,गजब है-पैसा-सत्ता . १२

टाटा-बिरला-अम्बानी,पैसे का सब खेल .देश-समाज सब भाङ में,सत्ता से है मेल .
सत्ता से है मेल,विदेशी-दुश्मनों संग, पींग बढाते हैं ऊँची,यह देश हुआ तंग .
कह साधक,अब देश बचाये कोई बिरला.सब पैसे के पीछे पागल टाटा-बिरला . १३.

ममता कुर्सी मांगती,खेत का लेकर नाम.वाम-पंथ को भी मिले सत्ता संग आराम.
सत्ता संग आराम,तो कैसे बात मान ले. टाटा भले चले जायें,चाहे जगत जान ले .
कह साधक कवि, आज धरा संकल्प मांगती,बदलो यह दुश्चक्र, कि ममता कुर्सी मांगती.१४.

जवाब हाजिर है यहाँ हर सवाल का देख.समस्या से आगे रहे समाधान नित देख.
समाधान है देख,समस्या मानो कन्या.वर पहले से पैदा हुआ है करने धन्या .
यह साधक कविराय सदा से ही हाजिर है.हर सवाल का जवाब पहले से हाजिर है. १५.

जो होती सद्भावना,जनता से हो प्रेम .धर्म कभी ना त्यागते,स्वयं निभाते नेम .
स्वयं निभाते नेम,तो जनता सिर-आँखों पर,नेताओं की बात मानती आगे होकर.
कह साधक कविराय,नहीं हो स्वार्थ-साधना,जनता से हो प्रेम,जो होती सद्भावना .१६.

औरत के कारण घटे,महाभारत कई बार.दोहराई है बात ये सिंगुर में इसबार .
सिंगुर में इसबार,भिङ गये वाम-पंथी .ममता से टकराये,बुद्धू वाम-पंथी .
कह साधक राजा-बालक-तिरिया की शोहरत.समय साक्षी नहीं हारती कब्भी औरत . १७.

भारत की पहचान है , त्याग-धर्म-आचार .आज हुआ विपरीत ही, इन्डिया का व्यवहार .
इन्डिया का व्यवहार,अखरता आम-जनों को.पीङा देता जान-बूझकर राम-जनों को .
सुन साधक गीता-गायक की सही आन है.निश्चित जीते धर्म, भारत की पहचान है . १८.

कितनी भी विपरीत हो ,परिस्थिति सुन यार .पकङ के रखना राम को, होगा बेङा पार .
होगा बेङा पार ,आस्था बनी रहेगी .सुख-शान्ति और , सक्रियता भी बनी रहेगी.
कह साधक कविराय , राम की सदा जीत हो .परिस्थिति का क्या,कितनी भी विपरीत हो . १९.

परिवर्तन-हित चल रहे , जाने कितने काम. अपने –अपने ढंग से,लगे हुये निष्काम.
लगे हुये निष्काम,कि दिल में लगन एक है.विश्व-गुरु हो जल्दी भारत, अगन नेक है .
कह साधक,यह तंत्र नहीं है भारत के हित . इसीलिये सब लगे हुये हैं परिवर्तन हित . २०.

कितने- कितने दल बने, दल-दल हो गया देश.जहाँ हाथ रख दो वहीं दर्द-दर्द है देश
दर्द-दर्द है देश,मगर बेदर्द ये सत्ता .उल्लू हैं हर शाख, साक्षी पत्ता-पत्ता.
कह साधक कविराय,मची हर दिल में हल-चल,दल-दल हो गया देश,बने कितने-कितने दल.२१.

बाङ खेत को खा रही,नेता चाटे देश.क्षूद्र स्वार्थों के लिये,बेच रहे हैं देश.
बेच रहे हैं देश,करार- परमाणु देखो. हाइड-एक्ट में फँसकर, झूठ बोलते देखो .
यह साधक कविराय,कहे बोलो अब किसको ?नेता चाटे देश,खा रही बाङ खेत को. २२.

सिंगुर करके भी नहीं , जागे नेता-लोग .वही ढाक के तीन पात,पुनः फसेंगे लोग .
पुनः फसेंगे लोग,ये नैनो कार का चक्कर,फिर किसान उजङेंगे,करके देश को फक्कङ .
कह साधक कवि,क्या होगा यह कविता सुनके?जागा नहीं जहाँ कोई भी सिंगुर करके.२३.

जागे हो तो चल पङो,परिवर्तन हित यार.भाजपा भी क्या करे, सिस्टम है बेकार.
सिस्टम है बेकार,कोई भी दल या व्यक्ति,राम नहीं ला पायेगी कोई भी शक्ति.
कह साधक कवि, नये तन्त्र में राम आगे हो.परिवर्तन हित यार चल पङो जो जागे हो .२४.

शासन और प्रशासन का , निकल गया है राम. न्याय और कानून भी जैसे बने हराम.
ऐसे बने हराम, कि समझदार कोई भी. इनकी शरण में ना जायेगा यार कोई भी.
कह साधक कवि,कैसे जाये यह दुःशासन .निज आचरण से लेके आओ धर्म का शासन .२५.

हर हिन्दू एक राष्ट्र है,हिन्दु जगे एक बार.हिन्दु जगे तब ही चल्रे, वसुधा कुटुम विचार.
वसुधा कुटुम विचार, आचरण में जो आये. धरती के सारे संकट ,क्षण में कट जाये .
कह साधक कब उतरेगा, आचारणों में हिन्दु.प्रभु का यह आदेश ,सुनले हरेक हिन्दु .२६.

यह हिन्दू का देश है,सुनें खोलकर कान . सुनें सेकुलर-इसाई , सुनलें मुसलमान .
सुनलें मूसलमान,बचोगे तबतक केवल .खुले ना शिव का नेत्र,गनीमत तबतक केवल.
कह साधक


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