राजनीति ही कर रहे ममता हो या वाम. टाटा का भी देखलो निकल गया है राम.
निकल गया है राम,ना देखा हित जनता का. कार जरूरी है,या जरूरी हित लोगों का ?
कह साधक कविराय ,याद कर राम की नीति.राम छोङ कर भटक रही है राज की नीति. २.
टाटा ने दिखलाई है , नेता को औकात .दोनों ताकते रह गये ,नैनो की बारात .
नैनो की बारात ,ना जाने कहाँ रुकेगी .कृषकों को झांसा देकर के पुनः ठगेगी .
कह साधक कवि , कार –कृषक में मची लङाई . कृषि हारेगी,नैनो टाटा ने दिखलाई . ३.
जनता कहाँ है देखलो ,सिंगुर का मैदान .राजनीति- टाटा करे, जनता की ही हान .
जनता की ही हान ,जमीं दे दो या ना दो.मरना दोनों तरह ,किसी भी तरफ वोट दो.
कह साधक कवि,रावण हो गया तंत्र देखलो, सिंगुर का मैदान ,कहाँ जनता है देखलो . ४.
उल्टी गंगा बह रही, कृषक हुआ बेकार ,टाटा की खातिर बिछे,पलक-पाँवङे यार.
पलक-पाँवङे यार,देश ऋषि-कृषकों का था .ऐसे दिन भारत में हों किसने सोचा था ?
जब साधक कवि नेता खुद बन गया लफ़ँगा,कृषक हुआ बेकार,बह रही उल्टी गंगा . ५.
लुटते आये हैं सदा , खेती और किसान ,राजा ठाकुर ना रहे, ना ही जमींदार.
ना ही जमींदार, आ गया प्रजातन्त्र भी ,प्रजा मगर नीचे है ,हावी रहा तंत्र ही .
साधक आम आदमी सदा पिटते आये हैं .खेती और किसान सदा लुटते आये हैं . ६.
जो किसान खुद ना मरे ,वे सिंगुर में ढेर .हैं आश्रित इस तंत्र के , मरना देर-सबेर.
मरना देर-सबेर ,तो डर किस बात का प्यारे . करके निश्चय पलट व्यवस्था, समय पुकारे.
कह साधक कविराय,बदल लें किस्मत वे खुद .धरती की रक्षा करते वे,जो किसान खुद . ७.
ममता-टाटा-बुद्धदेव ,सबने लूटा खूब . सिंगुर बना है देश यह ,लूट मची भरपूर .
लूट मची भरपूर ,अमरीका को बुलवाया . परमाणु-करार की खातिर फिर लुटवाया .
कह साधक कविराय,मत धरो मन में समता .देश बचाओ मन में लेकर माँ की ममता. ८.
नेताओं के हाथ ही खतरे में है देश ,सिंगुर ने है दे दिया , साफ-साफ संदेश.
साफ-साफ संदेश,लुट रहे किसान बेबस . जमीं गई-टाटा भी गये,तो किसका है बस ?
कह साधक कवि ,नहीं दर्द कुछ नेताओं के .अच्छा है अब ,जूते मारो नेताओं के . ९.
वाम-पंथ ने कर लिया , पूँजी से गठ-जोङ ,टाटा को बुलवा लिया,ली किसान से होङ .
ली किसान से होङ ,कृषि के बदले गाङी .नीति और सिद्धान्त ,जमीं में गहरी गाङी .
कह साधक माया ना मिली ना राम पंथ को,सत्ता की ममता ने घेरा वाम-पंथ को . १०.
खूब कहावत बन गई, बाप बङा ना भैया,वाम-पंथ से पूछ लो सबसे बङा रूप्पैया .
सबसे बङा रुप्पैया ,टाटा ने बतला दी ,दोनों दलों को एकसाथ औकात दिखा दी.
कह साधक, जनता हाथी है,टाटा महावत.उठा सूँड से,पटक-पछाङे-खूब कहावत. ११.
पैसा-सत्ता-बाहुबल,राक्षसी गठ-जोङ .जनता को हैं लूटते, मचा-मचा कर होङ .
मचा-मचा कर होङ ,करोङों वारे-न्यारे ,टाटा चार सौ करोङ, सिंगुर में हारे .
पूछे साधक हिसाब ,जो पलटा दे पत्ता .एक-लाख में कार ,गजब है-पैसा-सत्ता . १२
टाटा-बिरला-अम्बानी,पैसे का सब खेल .देश-समाज सब भाङ में,सत्ता से है मेल .
सत्ता से है मेल,विदेशी-दुश्मनों संग, पींग बढाते हैं ऊँची,यह देश हुआ तंग .
कह साधक,अब देश बचाये कोई बिरला.सब पैसे के पीछे पागल टाटा-बिरला . १३.
ममता कुर्सी मांगती,खेत का लेकर नाम.वाम-पंथ को भी मिले सत्ता संग आराम.
सत्ता संग आराम,तो कैसे बात मान ले. टाटा भले चले जायें,चाहे जगत जान ले .
कह साधक कवि, आज धरा संकल्प मांगती,बदलो यह दुश्चक्र, कि ममता कुर्सी मांगती.१४.
जवाब हाजिर है यहाँ हर सवाल का देख.समस्या से आगे रहे समाधान नित देख.
समाधान है देख,समस्या मानो कन्या.वर पहले से पैदा हुआ है करने धन्या .
यह साधक कविराय सदा से ही हाजिर है.हर सवाल का जवाब पहले से हाजिर है. १५.
जो होती सद्भावना,जनता से हो प्रेम .धर्म कभी ना त्यागते,स्वयं निभाते नेम .
स्वयं निभाते नेम,तो जनता सिर-आँखों पर,नेताओं की बात मानती आगे होकर.
कह साधक कविराय,नहीं हो स्वार्थ-साधना,जनता से हो प्रेम,जो होती सद्भावना .१६.
औरत के कारण घटे,महाभारत कई बार.दोहराई है बात ये सिंगुर में इसबार .
सिंगुर में इसबार,भिङ गये वाम-पंथी .ममता से टकराये,बुद्धू वाम-पंथी .
कह साधक राजा-बालक-तिरिया की शोहरत.समय साक्षी नहीं हारती कब्भी औरत . १७.
भारत की पहचान है , त्याग-धर्म-आचार .आज हुआ विपरीत ही, इन्डिया का व्यवहार .
इन्डिया का व्यवहार,अखरता आम-जनों को.पीङा देता जान-बूझकर राम-जनों को .
सुन साधक गीता-गायक की सही आन है.निश्चित जीते धर्म, भारत की पहचान है . १८.
कितनी भी विपरीत हो ,परिस्थिति सुन यार .पकङ के रखना राम को, होगा बेङा पार .
होगा बेङा पार ,आस्था बनी रहेगी .सुख-शान्ति और , सक्रियता भी बनी रहेगी.
कह साधक कविराय , राम की सदा जीत हो .परिस्थिति का क्या,कितनी भी विपरीत हो . १९.
परिवर्तन-हित चल रहे , जाने कितने काम. अपने –अपने ढंग से,लगे हुये निष्काम.
लगे हुये निष्काम,कि दिल में लगन एक है.विश्व-गुरु हो जल्दी भारत, अगन नेक है .
कह साधक,यह तंत्र नहीं है भारत के हित . इसीलिये सब लगे हुये हैं परिवर्तन हित . २०.
कितने- कितने दल बने, दल-दल हो गया देश.जहाँ हाथ रख दो वहीं दर्द-दर्द है देश
दर्द-दर्द है देश,मगर बेदर्द ये सत्ता .उल्लू हैं हर शाख, साक्षी पत्ता-पत्ता.
कह साधक कविराय,मची हर दिल में हल-चल,दल-दल हो गया देश,बने कितने-कितने दल.२१.
बाङ खेत को खा रही,नेता चाटे देश.क्षूद्र स्वार्थों के लिये,बेच रहे हैं देश.
बेच रहे हैं देश,करार- परमाणु देखो. हाइड-एक्ट में फँसकर, झूठ बोलते देखो .
यह साधक कविराय,कहे बोलो अब किसको ?नेता चाटे देश,खा रही बाङ खेत को. २२.
सिंगुर करके भी नहीं , जागे नेता-लोग .वही ढाक के तीन पात,पुनः फसेंगे लोग .
पुनः फसेंगे लोग,ये नैनो कार का चक्कर,फिर किसान उजङेंगे,करके देश को फक्कङ .
कह साधक कवि,क्या होगा यह कविता सुनके?जागा नहीं जहाँ कोई भी सिंगुर करके.२३.
जागे हो तो चल पङो,परिवर्तन हित यार.भाजपा भी क्या करे, सिस्टम है बेकार.
सिस्टम है बेकार,कोई भी दल या व्यक्ति,राम नहीं ला पायेगी कोई भी शक्ति.
कह साधक कवि, नये तन्त्र में राम आगे हो.परिवर्तन हित यार चल पङो जो जागे हो .२४.
शासन और प्रशासन का , निकल गया है राम. न्याय और कानून भी जैसे बने हराम.
ऐसे बने हराम, कि समझदार कोई भी. इनकी शरण में ना जायेगा यार कोई भी.
कह साधक कवि,कैसे जाये यह दुःशासन .निज आचरण से लेके आओ धर्म का शासन .२५.
हर हिन्दू एक राष्ट्र है,हिन्दु जगे एक बार.हिन्दु जगे तब ही चल्रे, वसुधा कुटुम विचार.
वसुधा कुटुम विचार, आचरण में जो आये. धरती के सारे संकट ,क्षण में कट जाये .
कह साधक कब उतरेगा, आचारणों में हिन्दु.प्रभु का यह आदेश ,सुनले हरेक हिन्दु .२६.
यह हिन्दू का देश है,सुनें खोलकर कान . सुनें सेकुलर-इसाई , सुनलें मुसलमान .
सुनलें मूसलमान,बचोगे तबतक केवल .खुले ना शिव का नेत्र,गनीमत तबतक केवल.
कह साधक
नवम्बर 6, 2008 को 11:49 पूर्वाह्न पर
उम्मेदजी
आपका हिन्दी चिट्ठाजगत में स्वागत है। आपने बह्त बढ़िया शुरुआत की। बधाई
आप अपने ब्लॉग को नारद, चिट्ठाजगत और ब्लॉगवाणी पर पंजीकृत करा लेवें, जिससे और भी कई लोग आपकी रचनाओं को पढ़ सके, प्रतिक्रिया दे सके।
http://www.blogvani.com/
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नवम्बर 21, 2008 को 11:29 पूर्वाह्न पर
सागर जी, नमस्कार.
आपका सुझाव मानता हूँ,मगर राह नही जानता.
कैसे करुँ स्वयं को पंजीकृत?…बतावें….उम्मेद साधक